आप किसके साथ है? - Ravi Pal

नेताओं के मुद्दों के साथ या अपने मुद्दों के साथ?

        यदि आप धर्मनिरपेक्षता के साथ है तो कांग्रेस के साथ है। जबकि यदि आप राष्ट्रबादी है तो आप भाजपा के साथ है। समानता के पक्षधर है तो आप बामपंथी है। पिछड़े-दलितों के उत्थान के साथ है यानी सामाजिक न्याय के पक्षधर है तो आप समाजबादियों के साथ है।
      अब जरा इसके विपरीत सोचिये, यदि कोई पार्टी साम्प्रदायिक (किसी पंथ विशेष के तरफ झुकाव) है तो क्या उनका राष्ट्रबाद सच्चा होगा? यदि किसी के लिये देश का स्थान उसके प्राथमिकता के सूची में नीचे कहीं है तो क्या वह सही मायने में धर्मनिरपेक्ष हो सकता है?


      यदि आप इन्ही सिद्धांत (किसी एक पक्ष के कारण) के साथ चले गए तो आप उसके अनुयायी हो गये, और पार्टियां बिल्कुल यही चाहती है। पार्टियां यही चाहती है कि आप सिर्फ़ उनके शब्दों को सुनें, समझें नहीं।
      यदि भाजपा राष्ट्रबादी होता तो उसका pdp के गठबंधन न होता? कश्मीरी पंडित निर्वासित न होतें? कश्मीर समस्या, धारा 370 तथा समान नागरिक आचार संहिता ठंडे बस्ते में न होता? हिंदूवादी तथा सवर्णों के पार्टी होने के आरोप न लागतें?
      यदि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष होता तो सबसे ज्यादा बेरोजगारी, बेकरी, निरक्षरता, बीमारी, आंतकवादी का शिकार मुस्लिम न होता और न धार्मिक ढंगे होते? न सिखों का नरसंहार होता और न यह कहा जाता कि बड़े पर गिरने से जमीन हिलती ही है। साथ ही न तो गांधी परिवार का सल्तनत चलता और न आपातकाल लगता, देश का बंटवारा न होता।
       इसी प्रकार राजद, जद यू, सपा, बसपा आदि यदि समाजवादी होते तो पिछड़े आज भी पिछड़े न होते? सही मायने में आरक्षण को लागू करते न कि राजनीति करते? और न ही कांग्रेस की चापलूसी करते, साथ ही लालू और मुलायम परिवार का जन्म न होता? न्यायपालिका तथा कार्यपालिका, यूँ पिछड़ों-दलितों से रिक्त न होता? इत्यादि।
       दरअसल हमारी राजनीति सिर्फ और सिर्फ नारों से चलती है, यर्थाथों से नही। हरि हुई लाचार, कमज़ोर तथा बदले के भावना से प्रेरित जनता हर नारों को ऐसे पकड़ती है, जैसे डूबता कोई तिनका को पकड़ता है और हर बार डूब जाती है।
     बहुत हुआ। अब इन सारे सिद्धांतों को तिलांजलि दे दीजिये। प्रैक्टिकल सोचिये... सोचिये, जो शिक्षा आपके बच्चों को दी जा रही है, क्या वह उपयोगी है? क्या वह गुणवत्तापूर्ण है? यदि नही, तो इंकार कीजिये इस शिक्षा से।
     जो सरकार आपको रोजगार न दें सके उसे जनविरोधी मानिये, उसका हर स्तर पर विरोध करिये।रहने दीजिये fdi, विदेशी कंपनियों या अम्बानी, अडानी, टाटा, बाटा आदि को, बस देखिये आपके परिवार में, मुहल्ले में कितने उद्दोगपति बनें? जिस हाथ मे उद्यम नही उस हाथ मे सरकार के गर्दन होने चाहिये।
    भूल जाइए जीडीपी को, विकास दर आदि को, देखिये आपका संपत्ति कितना बढ़ा है? नहीं तो वित्तमंत्री सहित सारी वित्तियों संस्थाओं साइड में रहने दीजिये।
    
    यदि सड़कों पर आप और आपके बच्चे सुरक्षित नही है तो cm/pm को सुरक्षा का कोई हक नही है?


     माफ़ कीजियेगा, पर देश का विरोध करना ही पड़ेगा, देश की ख़ातिर, देशवासियों के ख़ातिर। याद रखिये, देश का मतलब सरकारी व्यवस्था नही देशवासी होता है।

आशा संगठान  Aasha Shangathan
आम आवाज शक्तिवर्धन अभियान"(AASHA)
चलो आशा के सा
Ravi pal - (9761880779)

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